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Saturday, December 31, 2011

नव वर्ष की शुभकामनायें !!!



           ब्लॉगर परिवार के सभी सदस्यों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकानाएं |


Monday, September 5, 2011

HAPPY TEACHER'S DAY.




सभी गुरुजनों को शिक्षक दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें |

Thursday, September 1, 2011

गणपति बाप्पा मोरिया !



सभी देशवासियों को गणेश चतुर्थी की बहुत बहुत शुभकामनायें |

Tuesday, August 30, 2011

ईद मुबारक !


सभी देशवासियों को ईद की बहुत बहुत बधाई |

Sunday, August 21, 2011

अब हमारी बारी है !



छिड चुकी है जंग अब कुछ कर दिखायेंगे यहाँ ,          
गंदगी को देश की जड़ से मिटायेगे यहाँ ,
दे चुके जीतना था देना उन शहीदों ने हमें ,
उनके पांव चूमने की अब ये सब तैयारी है ,
कर दिया जितना था करना, अब हमारी बारी है | 


वक्त ने मौका दिया है फिर सम्भल जायेंगे अब  ,
जो नहीं कर पाए थे तब वो  दिखायेंगे हम अब ,
कूच कर दी है अभी अब जीतने की बारी  है ,
कर दिया जितना था करना, अब हमारी बारी है | 


देश का गौरव बचाना ये  तो अपना फ़र्ज़ है ,                              
अब चूका देंगे ऐ माँ जितना भी हम पर क़र्ज़ है,
एक क्रांति हो चुकी अब दूसरी की बारी है ,
कर दिया जितना था करना, अब हमारी बारी है |


ऐ शहीदों माफ करना भूल जो हमसे हुई ,
कर रहे थे भूल जो  खुद पे ही भारी पड़ गयी ,
मान कर तेरी नसीहत सीख ली खुददारी ,
कर दिया जितना था करना, अब हमारी बारी है |  




                                                       
वंदे मातरम , वंदे मातरम , वंदे मातरम |

Sunday, July 31, 2011

माँ मुझे तेरी बहुत याद आती है !!!


 अम्बर से देखता हूँ तो धरती पर एक ही चीज़ नज़र आती है ,
यूँ लगता है मानो वो हर बार मुझे चिढाती है ,
हर बार लगता है की अब सब सुधर जायेगा ,
इस बार मेरा अस्तित्व धरती पर नज़र आएगा, 
मैं भी माँ की गोद में खेलकर बड़ा हो जाऊँगा ,
मैं भी बस्ता लेकर स्कूल पढ़ने जाऊँगा ,
पर हर बार ये ख्वाहिश अधूरी ही रह जाती है ,
माँ मुझे तेरी बहुत याद आती है, माँ मुझे तेरी बहुत याद आती है |


बीज बन कर मै तेरे अन्दर आया था ,
मैंने भी अपना एक संसार बनाया था ,
सोचा था की बाहर आकर इस दुनिया को देखूँगा,
दोस्तों के साथ मैं भी नदी में कंकड़ फेकूंगा,
पर तूने तो मुझे बाहर आने ही न दिया ,
मेरा गला तो तूने गर्भ मे ही घोंट दिया,
मरने के बाद भी मेरी रूह को तू बहुत लुभाती है ,
माँ मुझे तेरी बहुत याद आती है,माँ मुझे तेरी बहुत याद आती है |


इस बात का गम नहीं की में इस धरती पर नहीं आया ,
गम इस बात का है की तुझे एक झलक देख भी नहीं पाया ,
पापा हर बार तुम्हारी सुन्दरता की तारीफ किया करते थे ,
मैं अन्दर से सुनता था वो हर बार यही कहा करते थे ,
फिर ऐसा क्या हुआ जो तूने मुझे मार दिया ,
मुझे मेरे सपनो को पूरा करने के लिए धरती पर आने ही नहीं दिया ,
भले ही पैदा करके तो मुझे कहीं और छोड़ आती ,
पर नौ माह के बाद एक बार मुझे कम से कम अपना चेहरा तो दिखाती ,
कैसी माँ है तू जो मुझे नौ माह अन्दर रखकर भी प्यार नहीं दे पाती है ,
 पर माँ मुझे अब भी तेरी बहुत याद आती है, मुझे तेरी बहुत याद आती है ||||

  

Wednesday, July 27, 2011

स्वप्नलोक !




खामोश रातें अक्सर ज़िन्दगी दिखा जाती हैं,
सपनों की खूबसूरत दुनिया की सैर करातीं हैं ,
हर रंग हर रूप यहाँ दिखता है ,
न प्यार न दोस्ती यहाँ कुछ भी नहीं बिकता है ,
हर ओर बस एक नयी सुबह नज़र आती है ,  
सपनों की खूबसूरत दुनिया की सैर करातीं हैं |




ज़िन्दगी कुछ इस तरह भी बनायीं जा सकती है ,
हर तरफ रौशनी भी दिखाई जा सकती है ,
फिर भी हर बार हम स्याह ही क्यूँ निकालते हैं ,
कुछ उजला और सफ़ेद हम हर बार क्यूँ टालते हैं ,
डरते हैं कहीं दाग न लग जाये ,
कोई अपना कहीं हमें फिर न ठग जाये ,
 ये सोच हमें हर बार उस नींद से दूर ले जा
जहाँ रातें हमें सपनों की खूबसूरत दुनिया की सैर करातीं हैं |




क्यूँ न आज हम गहरी नींद में चले जाएँ ,                               
उस स्वप्नलोक की खूबसूरती को एक बार तो देखकर आयें ,
जहाँ हर तरफ सिर्फ बेहिसाब नज़ारे हों ,
झिलमिलाते दूधिया और शांत सितारे हों ,
ये दुनिया हमारी सारी थकान मिटा देगी ,
कोई तकलीफ भी थी हमें ये भी भुला देगी ,
ऐसी दुनिया हमें सिर्फ आँखें बंद करके ही क्यूँ नज़र आती है ,
जहाँ रातें हमें सपनों की खूबसूरत दुनिया की सैर करातीं हैं |


Wednesday, June 15, 2011

दोस्त फिर याद आएंगे !


 वक्त के साथ दायरे बढ़ते चले गए ,
बचपन के वो दोस्त बिछड़ते चले गए ,
उन यादों से आज भी मन मचल जाता है ,
तस्वीरों को पलटकर देखूं तो आज भी जी ललचाता है ,
इंटरवल में अपने टिफिन से ज्यादा दूसरे का लंच झांकना ,
और टीचर के हर सवाल पर दोस्त का मूंह ताकना ,
हर मुश्किल पर दोस्त ही सहारा लगता था ,
उसका हर जवाब जैसे ईश्वर का इशारा लगता था,
वक्त बेवक्त के झगड़े चन्द मिनट भी नहीं चल पाते थे ,
तिरछी निगाहों से मुस्कुराकर हम दोनों ही फिर एक हो जाते थे ,
हर बार झगड़े के बाद की दोस्ती और मज़बूत हो जाती थी ,
दोनों की ऑंखें ताउम्र दोस्ती की कसम खाती थीं ,
कॉलेज के दिनों मे भी दोस्ती की ये कहानी चलती रही ,
टिफिन से हट अब केन्टीन मे ज़िन्दगी सिमटती रही ,
वक्त बिताता गया और हम बिजी हो गए ,
जो कभी संयुक्त थे अब वो निजी हो गए ,
रोज़ की वो बातें अब चैटिंग में तब्दील हो गयीं ,
अब तो दोस्ती भी नेटवर्क में सील हो गयी ,
महीनो और सालों में अब एक बार मिल पाते हैं ,
हर बार फिर मिलेंगे ये कहकर हम फिर निकल जाते हैं ,
मिलने का ये सिलसिला सिमटता चला गया ,
दोस्तों की लिस्ट से कोई नाम हर बार कटता चला गया ,
अभी तो परिवार है हम शायद उन्हें भूल जायेंगे ,
पर अधेड़ उम्र के सन्नाटे मे वो दोस्त फिर याद आएंगे ,
वो दोस्त फिर याद आएंगे  |||||||   
 

 
  

  
 
 
 

  
 

Saturday, May 28, 2011

वक्त !@@@@@

वक्त से जीत पाना किसी के बस की बात नहीं ,
वक्त के आगे इन्सान तो क्या खुद खुदा की भी कोई औकात नहीं ,
कौन कहता की वक्त एक दिन बदल जाता है ,
ये तो वो हस्ती है जो हर बार हमें उन्ही तीन सुइयों के साथ मूंह चिढ़ता है ,
यूं लगता है मानो हमसे कुछ कह रहा है  ,
आखिर क्यूँ वो इस तरह बह रहा है ,
हम मूर्ख है जो उसकी जबां समझ नहीं पाए हैं  ,
वो क्या कह रहा है हम ये जान ही नहीं पाए हैं ,
वो कहता है की रुक कर सोच मैं आज ही दोबारा तेरे पास फिर आऊँगा ,
तेरी हर दुविधा को एक न एक दिन मैं ही मिटाऊँगा ,
पर हम मूर्ख उसे गुज़ारा वक्त जान कर भूल जाते हैं ,
वक्त के उस छिपे से इशारे को समझ  ही नहीं पाते हैं ,
याद रखना ऐ दोस्त की घडी की सुइयां भी एक वक्त दो बार बजाती हैं ,

ये तो एक चेतावनी है जो वो हमें हर बार दे जाती है ,
मानो वो कह रही हो की वक्त है तू अभी भी सम्भल जा ,
मान ले अपनी ग़लती और फिर से सुधर जा ,
वरना एक न एक दिन तू फिर मुझे कोसेगा ,
ग़लती न होने पर भी मुझे ही दोष देगा ,
पर मैं तब कुछ नहीं कर पाऊँगा ,
गुज़र चूका हूँगा मै ,
फिर लौट के न आऊँगा , 
गुज़र चूका हूँगा मै ,
फिर लौट के न आऊँगा ||||||

 

 
   

Sunday, May 15, 2011

खुद ही बनायेंगे


जीने का सबब हम फिर सीख जायेंगे ,
ग़म हो या ख़ुशी हम दोनों में ही मुस्कुराएंगे ,
कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

क्यूँ हम हर बार हक दे देते हैं दिल तोड़ने का ,
क्यूँ हम नहीं देते दंड यूँ छोड़ने का ,
अब तो न्यायलय हम ही सजायेंगे,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

कब माँगा था हमने अपने लिए हीरों का महल ,
हम तो अब रेत से ही ताजमहल बनायेंगे ,
भले ही कोई कोई अब साथ न दे हमारा ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

जीने का सबब हम फिर सीख जायेंगे ,
ग़म हो या ख़ुशी हम दोनों में ही मुस्कुराएंगे ,
कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |




Friday, April 15, 2011

जिये जा रहे थे



हम  अब भी उन यादों के सहारे जिये जा रहे थे ,
ग़म के पैमाने मुस्कुराते हुए पिए जा रहे थे ,
हमें तो ये गुमा भी न था कि कोई हमें भी याद करेगा ,
हम बेवजह ही अपने दिल को दुखा रहे थे,
हम अब भी उन यादों के सहारे जिये जा रहे थे ,
ग़म के पैमाने मुस्कुराते हुए पिए जा रहे थे |

अब एक पल भी मुस्कुराना मुश्किल हो गया था ,
अश्कों को यूं छिपाना बमुश्किल हो गया था ,
फिर भी न जाने क्यूँ हम यूँ खिलखिला रहे थे ,
हम अब भी उन यादों के सहारे जिये जा रहे थे ,
ग़म के पैमाने मुस्कुराते हुए पिए जा रहे थे |

ग़म का वो एक फ़साना पन्नो में दब गया था ,
कुछ था जो अब कहीं पर सीने में चुभ गया था ,
हम तो उसी दर्द के किनारे सिये जा रहे थे ,
हम अब भी उन यादों के सहारे जिये जा रहे थे ,
ग़म के पैमाने मुस्कुराते हुए पिए जा रहे थे |
 
 
 
 

Friday, March 25, 2011

अपना गुलाम कर लूंगी |

पंखों मैं दम है मैं उडान भर लूंगी ,
इस दुनिया को अब मैं अपने नाम कर लूंगी ,
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |

सरहदों का डर तो कभी था ही नहीं मुझको ,
अब तो हर मुल्क को अपने नाम कर लूंगी '
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |

घिर आयें कितने घनघोर बादल मगर ,
मैं गगन मैं भी नावों का इंतज़ाम कर लूंगी ,
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |

खुद के सपनों को तो पूरा करूंगी मगर ,
औरों के ख्वाबों को भी हकीक़त के नाम कर दूँगी ,
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |


Tuesday, March 22, 2011

मैं हूँ पराया


  एक शाम जब चाँद थोडा उदास था ,
एक शाम जब दिल थोडा बदहवास था ,
उस रोज़ न जाने क्यूँ ये एहसास हो गया ,
नज़रें थी खुलीं फिर भी ना जाने क्यूँ दिल सो गया ,
यूँ लगा की कुछ टूट रहा है तब , 
कोई जो था अपना छूट रहा है अब ,
सोचा की इस बार भी दिल को मना लेंगे ,
दिल को कुछ भी कह कर बहला लेंगे  ,
 पर ये दिल अब सयाना हो चला था ,
वो जान गया की उसे फिर फुसलाया जायेगा ,
                  कुछ नहीं सब भ्रम है ये पाठ फिर पढाया जायेगा ,
ये जानकर ही हमने दिल की निगाहों पे हाँथ रख दिया ,
जितना था देना तुझको वो तो तुने पहले ही दे दिया ,
अब क्या सांसें भी ग़ैरों के नाम कर देगा ,
वही तो एक तेरा है उसे भी क्या औरों के नाम कर देगा ,
दिल इस बार रो पड़ा और जोर से चिल्लाया ,
क्यूँ सुनता है हर बार मेरी , क्यूँ करता है यकीं मुझ पर ,
मैं हिस्सा तो हूँ तेरा , पर नहीं रहता कभी तेरा होकर, 
इस बार तुने फिर मुझसे धोखा खाया ,
अब तो मान भी जा ऐ मेरे दोस्त ,
मैं सिर्फ दिखता हूँ अपना ,
पर हकीकत मे मैं हूँ पराया |||||||||| 

Saturday, March 19, 2011

HAPPY HOLI TO ALL BLOGGERS...............

होली की शुभकामनायें |

           
                     

Tuesday, March 15, 2011

जीना आ गया

ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |                                    
कहते थे होंठों पर ग़म को आने नहीं देंगे ,
अब तो आंसुओं को भी सीना आ गया |

वो हर रोज़  मरने के लिए कहते थे मुझसे ,
कदम कदम पर डरने के लिए कहते थे मुझसे ,
मुझे इस दर्द में भी जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |
 
हर हाल में खुद को था संभाला हमने ,
हर दर्द को मरहम कहकर पला था हमने ,
मुफ़लिसी में भी शहंशाहों सा जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,                                           
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |
 
कहकहों से खुद को दूर ही रखा ,
मुस्कराहट का धोखे से स्वाद भी नहीं चक्खा ,
पतझड़ की अग्नि में भी जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |

Wednesday, March 9, 2011

ना तुम होगे , ना हम होंगे |

 धरती पर होगी शांत पवन ,                     
उन्मुक्त गगन , खुशनुमा चमन ,
चहुँ ओर उजाला हो बिखरा ,                                                        
चांदी सोना हो शुद्ध खरा ,                                  
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |

होगी प्रकृति तब हरी भरी ,
पानी से होंगीं नदी भरी ,
पक्षी का कलरव गूंजेगा ,
वृक्षों की होगी रेख बड़ी ,
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |


ना गलाकाट स्पर्धा हो ,
ना बेकारी की भूंख बड़ी ,
हर ओर विराजे शून्य शांति ,                                                         
और होगी तब एक अंत घडी ,
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |                                                  
 
ए मानव इतना याद रहे ,
तू ईश्वर की कठपुतली है ,
जब डोर उठा देगा तेरी ,
तब तेरी होगी लाश पड़ी ,
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |
   

Saturday, February 26, 2011

कांच की इमारतें

कांच की इमारतें टूटने से पहले ,
हर राज़ बयां कर देती हैं ,

अन्दर रहने वालों की नियत का ,
हर हाल बयां कर देती हैं ,

जो कुछ भी गहरे अन्दर है ,
सब साफ़ नज़र आ जाता है ,

है कैसी ज़िन्दगी उनकी,
सब ढंग पता चल जाता है ,

रात ढले इन शीशों में ,
रोशन सन्नाटा होता है ,

रंगीन महफ़िलें सजती हैं ,
हर जश्न बजा हो जाता है ,

इमारतें ये नाज़ुक हैं ,
लोग वो सब खुद भी कहते है ,

फिर भी न जाने बात है क्या ,
इन्हीं शीशों के घरों में रहते हैं ,

सीने में पत्थर रखते हैं ,
दिल मान उसे बहलाते हैं ,

फिर क्यूँ कर मेरे हाँथ में पत्थर ,
देख वो सब डर जाते हैं|||||||



       

Friday, February 25, 2011

बचपन

   बदहाल जहां पर बचपन है ,        
                  तो जवानी मुल्क की क्या होगी ,                 
हाथों की लकीरें मिटने लगीं ,
तो कहानी मुल्क की क्या होगी ,
कहीं चाय पिलाता बचपन है ,
कहीं मेज़ पोंछता  बाल ह्रदय ,
कहीं भूख से व्याकुल नेत्र दिखे ,
कहीं तंग सिसकता एक मन है ,
बदहाल जहां पर बचपन है ,
तो जवानी मुल्क की क्या होगी ,
हाथों की लकीरें मिटने लगीं ,
तो कहानी मुल्क की क्या होगी |
                                                




        इस देश के नेता कहते हैं ,
  कि देश हमारा खूब बढ़ा ,
वो भूल गए हैं बात यही ,
बचपन मे  है अवरोध खड़ा  ,
शिक्षा की कमी भोजन की कमी ,
तो नूर -ए-कहानी क्या होगी ,
बदहाल जहां पर बचपन है ,
तो जवानी मुल्क की क्या होगी ,
  हाथों की लकीरें मिटने लगीं ,
                                                      तो कहानी मुल्क की क्या होगी |
                                                     













चाचा  नेहेरू  के देश मे ये ,
बचपन का देखो हाल सभी ,
जहाँ होती थी गुल की खुशबू ,
वहां ईंट उठाती गुल होगी ,
बदहाल जहां पर बचपन है ,
तो जवानी मुल्क की क्या होगी ,
हाथों की लकीरें मिटने लगीं ,
तो कहानी मुल्क की क्या होगी ,
                                                               

                                               नन्हे हाथों की रेखाएं ,
                                                        कंकड़ पत्थर से मिटने लगीं ,
                                                       नन्हे का बचपन खोने लगा ,
                                                      रेखा की कहानी क्या होगी ,         
                                                      बदहाल जहां पर बचपन है ,
                                                     तो जवानी मुल्क की क्या होगी ,
                                                      हाथों की लकीरें मिटने लगीं ,
                                                      तो कहानी मुल्क की क्या होगी |
                                                       
                                                       बचपन जब तक भूखा होगा ,
                                                        मज़बूत जवानी क्या होगी ,
                                                      बदहाल जहां पर बचपन है ,
                                                      तो जवानी मुल्क की क्या होगी ,
                                                       हाथों की लकीरें मिटने लगीं ,
                                                      तो कहानी मुल्क की क्या होगी ||||||||
 



Wednesday, February 23, 2011

परदा


परदा नज़ाकत  का , परदा शर्म  का ,       
परदा संस्कारों का , परदा विचारों का ,
परदा दरवाजे का , परदा जनाज़े का ,
परदा पर्वतों का , परदा औरतों का ,
परदा आतंक का , परदा सरहदों का ,
परदा फिल्म का , परदा बुजुर्गों के इल्म का ,
सब कुछ सहेज  रखा है इस परदे ने अब तक ,
न जाने रोक पायेगा इन राज़ों को कब तक ,
सच तो ये है की और भी कुछ भयानक हो सकता था ,
कम खोया है हमने और भी कुछ खो सकता था ,














शुक्र है खुदा का जो हमारे दिमाग पर परदा डाल रखा है ,
हम बहुत समझदार हैं हमे इस गुमान मैं पाल रखा है ,
वरना आज तक न जाने कितनी बहने बेपर्दा हो चुकी होतीं ,
और अपने जर्जर अंचल को देखकर हर बार रोतीं ,
संस्कारों के एक परदे ने युवा मन को सख्ती से रोक रखा है ,
ये यकीं दिलाने के लिए की परदे पर दिखने वाला दृश्य तो बस एक धोखा है ,
औरतों मैं नजाकत का वो परदा अब बाक़ी ही ही कहाँ रहा ,


हर बार जब किसी बुज़ुर्ग ने अपनी पोती से कहा ,
बेटी जींस की जगह सूट पहन कर जाया करो ,
पोती बोली दादाजी हर बार वही पुरानी बात मत दोहराया करो ,
सूट और दुपट्टे तो अब गुज़ारे ज़माने हो गए ,
बड़े बूढों  के संस्कार न जाने किस दुनियां में खो गए ,
कल तक जो नजाकत हुआ करती थी आज वो ओल्ड फैशन हो गया ,
अब तक जिस पर भी परदा था हक़ीकत तो ये है की वो सब बेपर्दा हो गया ------------------------------------------------------------------------
  

 
 

मासूम कली

             ' मासूम कली मुस्काई थी,              
              अभी थोडा ही शरमाई थी,
              आँखों को उसने खोला था,
            और सपनों कि अंगड़ाई थी,
             नापाक निगाहों ने उसपर 
            कुछ ऐसा दृष्टिपात किया
मासूम कली के यौवन पर,                 
            निर्ममता से यूँ वार किया,
            चिल्लाई कली तडपी बेहद,
             आंचल को लेकर भागी वो,
             खुद कि ही लाज बचने को,
  
बेहाल कली यूँ कुचली गयी, 
            नापाक निगाहों के  हांथों,
            तब गरज बरस के एक स्वर
             नभ मे यूँ एकाएक गूंजा,   
            
ऐ दुष्ट निर्दयी दानव तू,
             कब तक ये रूप दिखायेगा,
             नारी कि कोख से उपजा तू,  
             इस धरती मे मिल जायेगा,
  
लगता है तू  अब भूल गया अपनी माँ के उस आंचल को,
   तेरी बेटी ही भुगतेगी अब तेरे इन पापों को,
     तब रोयेगा तू पछतायेगा,
    पर कुछ न करने पयेगा 
     और तेरा ही वो निर्मम शब्द,
                तुझे अंत काल दिखलायेगा,
                 ऐ दुष्ट आत्मा याद रहे,
                 तू भी नारी का हिस्सा है,
                 ये तल्ख़ शब्द सिर्फ व्यंग नहीं,
                     इस धरती का ही किस्सा है'-----------------------------------------
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