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Saturday, February 26, 2011

कांच की इमारतें

कांच की इमारतें टूटने से पहले ,
हर राज़ बयां कर देती हैं ,

अन्दर रहने वालों की नियत का ,
हर हाल बयां कर देती हैं ,

जो कुछ भी गहरे अन्दर है ,
सब साफ़ नज़र आ जाता है ,

है कैसी ज़िन्दगी उनकी,
सब ढंग पता चल जाता है ,

रात ढले इन शीशों में ,
रोशन सन्नाटा होता है ,

रंगीन महफ़िलें सजती हैं ,
हर जश्न बजा हो जाता है ,

इमारतें ये नाज़ुक हैं ,
लोग वो सब खुद भी कहते है ,

फिर भी न जाने बात है क्या ,
इन्हीं शीशों के घरों में रहते हैं ,

सीने में पत्थर रखते हैं ,
दिल मान उसे बहलाते हैं ,

फिर क्यूँ कर मेरे हाँथ में पत्थर ,
देख वो सब डर जाते हैं|||||||



       

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

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  2. आपकी बात बहुत बेबाक है.. सुन्दर अभिव्यक्ति... आपका ब्लॉग और आपकी यह रचना कल चर्चामंच पर रखूंगी ...
    कल आप वहाँ भी आयें और अपने विचार दें.. और अमृतरस ब्लॉग में भी आपका स्वागत है...
    http://charchamanch.blogspot.com
    http://amritras.blogspot.com

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  3. सच में कांच की दीवारें .....व्यक्ति चाहे खुद को छुपाने का कितना भी प्रयास करे ..लेकिन वास्तविकता सामने आ जाती है ..सुंदर भावाभिव्यक्ति

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  4. बहुत सुन्दर!!

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  5. सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  6. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  7. शीशे के घरों में देखो तो पत्थर दिल वाले बसते हैं !

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  8. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

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  9. बहुत सच्ची और सुन्दर रचना ! शीशे के घरों में रहने वाले पत्थर हाथ में रखने वालों से डरते ही हैं ! बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ! बधाई एवं शुभकामनायें

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  10. अन्दर रहने वालों की नियत का ,
    हर हाल बयां कर देती हैं ,
    जो कुछ भी गहरे अन्दर है ,
    सब साफ़ नज़र आ जाता है ,.....

    यथार्थपरक बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई।

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