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Friday, March 25, 2011

अपना गुलाम कर लूंगी |

पंखों मैं दम है मैं उडान भर लूंगी ,
इस दुनिया को अब मैं अपने नाम कर लूंगी ,
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |

सरहदों का डर तो कभी था ही नहीं मुझको ,
अब तो हर मुल्क को अपने नाम कर लूंगी '
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |

घिर आयें कितने घनघोर बादल मगर ,
मैं गगन मैं भी नावों का इंतज़ाम कर लूंगी ,
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |

खुद के सपनों को तो पूरा करूंगी मगर ,
औरों के ख्वाबों को भी हकीक़त के नाम कर दूँगी ,
लाख रोके उस गगन का कोई बाज़ मगर ,
उस बाज़ को भी अपना गुलाम कर दूँगी |


Tuesday, March 22, 2011

मैं हूँ पराया


  एक शाम जब चाँद थोडा उदास था ,
एक शाम जब दिल थोडा बदहवास था ,
उस रोज़ न जाने क्यूँ ये एहसास हो गया ,
नज़रें थी खुलीं फिर भी ना जाने क्यूँ दिल सो गया ,
यूँ लगा की कुछ टूट रहा है तब , 
कोई जो था अपना छूट रहा है अब ,
सोचा की इस बार भी दिल को मना लेंगे ,
दिल को कुछ भी कह कर बहला लेंगे  ,
 पर ये दिल अब सयाना हो चला था ,
वो जान गया की उसे फिर फुसलाया जायेगा ,
                  कुछ नहीं सब भ्रम है ये पाठ फिर पढाया जायेगा ,
ये जानकर ही हमने दिल की निगाहों पे हाँथ रख दिया ,
जितना था देना तुझको वो तो तुने पहले ही दे दिया ,
अब क्या सांसें भी ग़ैरों के नाम कर देगा ,
वही तो एक तेरा है उसे भी क्या औरों के नाम कर देगा ,
दिल इस बार रो पड़ा और जोर से चिल्लाया ,
क्यूँ सुनता है हर बार मेरी , क्यूँ करता है यकीं मुझ पर ,
मैं हिस्सा तो हूँ तेरा , पर नहीं रहता कभी तेरा होकर, 
इस बार तुने फिर मुझसे धोखा खाया ,
अब तो मान भी जा ऐ मेरे दोस्त ,
मैं सिर्फ दिखता हूँ अपना ,
पर हकीकत मे मैं हूँ पराया |||||||||| 

Saturday, March 19, 2011

HAPPY HOLI TO ALL BLOGGERS...............

होली की शुभकामनायें |

           
                     

Tuesday, March 15, 2011

जीना आ गया

ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |                                    
कहते थे होंठों पर ग़म को आने नहीं देंगे ,
अब तो आंसुओं को भी सीना आ गया |

वो हर रोज़  मरने के लिए कहते थे मुझसे ,
कदम कदम पर डरने के लिए कहते थे मुझसे ,
मुझे इस दर्द में भी जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |
 
हर हाल में खुद को था संभाला हमने ,
हर दर्द को मरहम कहकर पला था हमने ,
मुफ़लिसी में भी शहंशाहों सा जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,                                           
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |
 
कहकहों से खुद को दूर ही रखा ,
मुस्कराहट का धोखे से स्वाद भी नहीं चक्खा ,
पतझड़ की अग्नि में भी जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |

Wednesday, March 9, 2011

ना तुम होगे , ना हम होंगे |

 धरती पर होगी शांत पवन ,                     
उन्मुक्त गगन , खुशनुमा चमन ,
चहुँ ओर उजाला हो बिखरा ,                                                        
चांदी सोना हो शुद्ध खरा ,                                  
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |

होगी प्रकृति तब हरी भरी ,
पानी से होंगीं नदी भरी ,
पक्षी का कलरव गूंजेगा ,
वृक्षों की होगी रेख बड़ी ,
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |


ना गलाकाट स्पर्धा हो ,
ना बेकारी की भूंख बड़ी ,
हर ओर विराजे शून्य शांति ,                                                         
और होगी तब एक अंत घडी ,
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |                                                  
 
ए मानव इतना याद रहे ,
तू ईश्वर की कठपुतली है ,
जब डोर उठा देगा तेरी ,
तब तेरी होगी लाश पड़ी ,
उस वक्त कहाँ जीवन होंगे ,
ना तुम होगे ना हम होंगें |
   
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