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Tuesday, March 15, 2011

जीना आ गया

ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |                                    
कहते थे होंठों पर ग़म को आने नहीं देंगे ,
अब तो आंसुओं को भी सीना आ गया |

वो हर रोज़  मरने के लिए कहते थे मुझसे ,
कदम कदम पर डरने के लिए कहते थे मुझसे ,
मुझे इस दर्द में भी जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |
 
हर हाल में खुद को था संभाला हमने ,
हर दर्द को मरहम कहकर पला था हमने ,
मुफ़लिसी में भी शहंशाहों सा जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,                                           
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |
 
कहकहों से खुद को दूर ही रखा ,
मुस्कराहट का धोखे से स्वाद भी नहीं चक्खा ,
पतझड़ की अग्नि में भी जीना आ गया ,
ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना..

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  2. हर हाल में खुद को था संभाला हमने ,
    हर दर्द को मरहम कहकर पला था हमने ,
    मुफ़लिसी में भी शहंशाहों सा जीना आ गया ,
    ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया

    बेहद खुबसूरत भाव ..जीवन के विविध रंगों से सजे हुए ..इस रचना को पढ़कर हमें भी आनंद आ गया ..आप यूँ ही लिखते रहें ..और हमें आनंदित करते रहें ...आपका आभार

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  3. बहुत अच्छी भावपूर्ण प्रस्तुति| धन्यवाद|

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  4. वो हर रोज़ मरने के लिए कहते थे मुझसे ,
    कदम कदम पर डरने के लिए कहते थे मुझसे ,
    मुझे इस दर्द में भी जीना आ गया ,
    ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
    मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |---------------------------कृति जी, सच में आपकी रचना काफ़ी प्रभावशाली है। उम्मीद है आप आगे भी ऐसी ही सशक्त रचनायें लिखती रहेंगी। मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं।

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  5. कहकहों से खुद को दूर ही रखा ,
    मुस्कराहट का धोखे से स्वाद भी नहीं चक्खा ,
    पतझड़ की अग्नि में भी जीना आ गया ,
    ज़िन्दगी के हर ग़म को पीना आ गया ,
    मुझे अब ग़म में भी जीना आ गया |
    बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने

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  6. कहते थे होंठों पर ग़म को आने नहीं देंगे ,
    अब तो आंसुओं को भी सीना आ गया bauth accha likha hai D padh ke accha laga app ne itna accha lekha hai

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