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Tuesday, March 22, 2011

मैं हूँ पराया


  एक शाम जब चाँद थोडा उदास था ,
एक शाम जब दिल थोडा बदहवास था ,
उस रोज़ न जाने क्यूँ ये एहसास हो गया ,
नज़रें थी खुलीं फिर भी ना जाने क्यूँ दिल सो गया ,
यूँ लगा की कुछ टूट रहा है तब , 
कोई जो था अपना छूट रहा है अब ,
सोचा की इस बार भी दिल को मना लेंगे ,
दिल को कुछ भी कह कर बहला लेंगे  ,
 पर ये दिल अब सयाना हो चला था ,
वो जान गया की उसे फिर फुसलाया जायेगा ,
                  कुछ नहीं सब भ्रम है ये पाठ फिर पढाया जायेगा ,
ये जानकर ही हमने दिल की निगाहों पे हाँथ रख दिया ,
जितना था देना तुझको वो तो तुने पहले ही दे दिया ,
अब क्या सांसें भी ग़ैरों के नाम कर देगा ,
वही तो एक तेरा है उसे भी क्या औरों के नाम कर देगा ,
दिल इस बार रो पड़ा और जोर से चिल्लाया ,
क्यूँ सुनता है हर बार मेरी , क्यूँ करता है यकीं मुझ पर ,
मैं हिस्सा तो हूँ तेरा , पर नहीं रहता कभी तेरा होकर, 
इस बार तुने फिर मुझसे धोखा खाया ,
अब तो मान भी जा ऐ मेरे दोस्त ,
मैं सिर्फ दिखता हूँ अपना ,
पर हकीकत मे मैं हूँ पराया |||||||||| 

8 comments:

  1. बहुत मर्मस्पर्शी लिखा है आपने!

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  2. सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

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  3. बहुत मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति|धन्यवाद|

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  4. बहुत ही सुन्दर कविता ... दर्द भरा ...आपकी ब्लॉग 4 world me parichay hai jo ki aaj charchamanch par hai... aap charchamanch me aa kar apne vicharon se anugrahit karen...

    http://charchamanch.blogspot.com/2011/03/blog-post_25.html

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  5. अपने भावो को बहुत सुंदरता से तराश कर अमूल्य रचना का रूप दिया है.

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