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Saturday, May 28, 2011

वक्त !@@@@@

वक्त से जीत पाना किसी के बस की बात नहीं ,
वक्त के आगे इन्सान तो क्या खुद खुदा की भी कोई औकात नहीं ,
कौन कहता की वक्त एक दिन बदल जाता है ,
ये तो वो हस्ती है जो हर बार हमें उन्ही तीन सुइयों के साथ मूंह चिढ़ता है ,
यूं लगता है मानो हमसे कुछ कह रहा है  ,
आखिर क्यूँ वो इस तरह बह रहा है ,
हम मूर्ख है जो उसकी जबां समझ नहीं पाए हैं  ,
वो क्या कह रहा है हम ये जान ही नहीं पाए हैं ,
वो कहता है की रुक कर सोच मैं आज ही दोबारा तेरे पास फिर आऊँगा ,
तेरी हर दुविधा को एक न एक दिन मैं ही मिटाऊँगा ,
पर हम मूर्ख उसे गुज़ारा वक्त जान कर भूल जाते हैं ,
वक्त के उस छिपे से इशारे को समझ  ही नहीं पाते हैं ,
याद रखना ऐ दोस्त की घडी की सुइयां भी एक वक्त दो बार बजाती हैं ,

ये तो एक चेतावनी है जो वो हमें हर बार दे जाती है ,
मानो वो कह रही हो की वक्त है तू अभी भी सम्भल जा ,
मान ले अपनी ग़लती और फिर से सुधर जा ,
वरना एक न एक दिन तू फिर मुझे कोसेगा ,
ग़लती न होने पर भी मुझे ही दोष देगा ,
पर मैं तब कुछ नहीं कर पाऊँगा ,
गुज़र चूका हूँगा मै ,
फिर लौट के न आऊँगा , 
गुज़र चूका हूँगा मै ,
फिर लौट के न आऊँगा ||||||

 

 
   

Sunday, May 15, 2011

खुद ही बनायेंगे


जीने का सबब हम फिर सीख जायेंगे ,
ग़म हो या ख़ुशी हम दोनों में ही मुस्कुराएंगे ,
कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

क्यूँ हम हर बार हक दे देते हैं दिल तोड़ने का ,
क्यूँ हम नहीं देते दंड यूँ छोड़ने का ,
अब तो न्यायलय हम ही सजायेंगे,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

कब माँगा था हमने अपने लिए हीरों का महल ,
हम तो अब रेत से ही ताजमहल बनायेंगे ,
भले ही कोई कोई अब साथ न दे हमारा ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

जीने का सबब हम फिर सीख जायेंगे ,
ग़म हो या ख़ुशी हम दोनों में ही मुस्कुराएंगे ,
कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |




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