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Sunday, May 15, 2011

खुद ही बनायेंगे


जीने का सबब हम फिर सीख जायेंगे ,
ग़म हो या ख़ुशी हम दोनों में ही मुस्कुराएंगे ,
कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

क्यूँ हम हर बार हक दे देते हैं दिल तोड़ने का ,
क्यूँ हम नहीं देते दंड यूँ छोड़ने का ,
अब तो न्यायलय हम ही सजायेंगे,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

कब माँगा था हमने अपने लिए हीरों का महल ,
हम तो अब रेत से ही ताजमहल बनायेंगे ,
भले ही कोई कोई अब साथ न दे हमारा ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

जीने का सबब हम फिर सीख जायेंगे ,
ग़म हो या ख़ुशी हम दोनों में ही मुस्कुराएंगे ,
कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |




8 comments:

  1. कब माँगा था हमने अपने लिए हीरों का महल ,
    हम तो अब रेत से ही ताजमहल बनायेंगे ,
    भले ही कोई कोई अब साथ न दे हमारा ,
    हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |
    ye hui n baat , main hun saath

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  2. कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
    हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |

    बहुत अच्छी बात कही आपने.

    सादर

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  3. यही ज़ज्बा होना चाहिये...उम्दा सोच, जानदार रचना. बधाई.

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  4. एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
    यही विशे्षता तो आपकी अलग से पहचान बनाती है!

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  5. बहुत अच्छी बात कही आपने| धन्यवाद|

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  6. यही जोश बरकरार रहना चाहिए ..अच्छी सोच

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  7. जीने का सबब हम फिर सीख जायेंगे ,
    ग़म हो या ख़ुशी हम दोनों में ही मुस्कुराएंगे ,
    कोई कितना ही हमें बेसहारा कर दे ,
    हम तो अब अपनी सीढियाँ खुद ही बनायेंगे |
    ...bahut achhi sakaratmak prastutit...

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