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Sunday, February 19, 2012

बूढ़ा दरख्त !!


                                       
बूढ़ा हूँ झड़ जाऊँगा,                                                                             एक दिन मर जाऊँगा,


बहुतों को छाँव दी थी मैंने,
बहुतों को निवाले दिए,
अब सब कुछ छोड़ कर चला जाऊँगा,
बूढ़ा हूँ झड़ जाऊँगा,
एक दिन मर जाऊँगा |


कुछ को अब बोझ लग रहा हूँ,
कुछ को शायद अफ़सोस लग रह हूँ,
क्या करूं अब फल नहीं दे पाऊँगा,
बूढ़ा हूँ झड़ जाऊँगा,
एक दिन मर जाऊँगा |

किसी होलिका की आहुति बन जाऊँगा मैं,
या किसी नदी मैं तैरते हुए निकल जाऊँगा,
बूढ़ा हूँ झड़ जाऊँगा,
एक दिन मर जाऊँगा |

वक्त ने बहुत साथ दिया मेरा,                          
पर मेरे फल मेरा साथ दे ना सके,
अब उन फलों के लिए दिल नहीं दुखाऊंगा,
बूढ़ा हूँ झड़ जाऊँगा,
एक दिन मर जाऊँगा |

 

  

3 comments:

  1. बूढ़े दरख्त के दर्द को बखूबी उभारा है आपने।

    सादर

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  2. गहन अभिवयक्ति......

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  3. वक्त ने बहुत साथ दिया मेरा,
    पर मेरे फल मेरा साथ दे ना सके,
    अब उन फलों के लिए दिल नहीं दुखाऊंगा,
    बूढ़ा हूँ झड़ जाऊँगा,
    एक दिन मर जाऊँगा |
    कड़वी सच्चाई की अभिव्यक्ति ........... !!

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